वर्तमान सदस्य (2017)

क्रम संख्यानिर्वाचन क्षेत्रनिर्वाचित सदस्यदल संबद्धता (यदि है तो)
पुरोला (एससी) राजेश उराफ कांग्रेस
गंगोत्री गोपाल सिंह रावत भारतीय जनता पार्टी
यमनोत्री केदार सिंह कांग्रेस
प्रतापनगर विजय सिंह (गुड्डू पँवार) भारतीय जनता पार्टी
टिहरी किशोर उपाध्याय कांग्रेस
घंसाली बलवीर सिंह नेगी कांग्रेस
देवप्रयाग दिवाकर भट्ट उत्तराखण्ड क्रान्ति दल
नरेन्द्र नगर ओम गोपाल उत्तराखण्ड क्रान्ति दल
धनौल्टी (एससी) खजान दास भारतीय जनता पार्टी
१० चक्राता (एसटी) प्रीतम सिंह कांग्रेस
११ विकासनगर मुन्न सिंह चौहान भारतीय जनता पार्टी
१२ सहसपुर (एससी) राजकुमार भारतीय जनता पार्टी
१३ लक्ष्मण चौक दिनेश अग्रवाल कांग्रेस
१४ देहरादून हरबंस कपूर भारतीय जनता पार्टी
१५ राजपुर गणेश जोशी भारतीय जनता पार्टी
१६ मसूरी जोत सिंह गुंसोला कांग्रेस
१७ ऋषिकेश प्रेम चन्द अग्रवाल भारतीय जनता पार्टी
१८ डोइवाला त्रिवेन्द्र सिंह रावत भारतीय जनता पार्टी
१९ भगवानपुर (एससी) सुरेन्द्र राकेश बहुजन समाज पार्टी
२० रुड़की सुरेश चन्द जैन भारतीय जनता पार्टी
२१ इक़बालपुर चौधरी यशवीर सिंह बहुजन समाज पार्टी
22 मंगलौर काज़ी मु. निज़ामुद्दीन बहुजन समाज पार्टी
२३ लंढौरा (एससी) हरिदास बहुजन समाज पार्टी
२४ लक्सर प्रणव सिंह कांग्रेस
२५ बहादराबाद शहज़ाद बहुजन समाज पार्टी
२६ हरिद्वार मदन कौशिक भारतीय जनता पार्टी
२७ लालढांग तसलीम अहमद बहुजन समाज पार्टी
२८ यमकेश्वर विजय बड़थवाल भारतीय जनता पार्टी
२९ कोटद्वार सुरेन्द्र सिंह रावत भारतीय जनता पार्टी
३० धूमाकोट मे. जन. (से. नि.) भुवन चन्द्र खण्डूरी भारतीय जनता पार्टी
३१ बीरोंखाल अमृता रावत कांग्रेस
३२ लैन्सडॉन डॉ॰ हरक सिंह रावत कांग्रेस
३३ पौड़ी यशपाल बीनम निर्दलीय
३४ श्रीनगर (एससी) बृज मोहन कोटवाल भारतीय जनता पार्टी
३५ थालीसैंण डॉ॰ रमेश पोखरियाल "निशंक" भारतीय जनता पार्टी
३६ रुद्रप्रयाग मतबर सिंह कण्डारी भारतीय जनता पार्टी
३७ केदारनाथ आशा नौटियाल भारतीय जनता पार्टी
३८ बद्रीनाथ केदार सिंह फोनिया भारतीय जनता पार्टी
३९ नन्दप्रयाग राजेन्द्र सिंह भण्डारी निर्दलीय
४० कर्णप्रयाग अनिल नौटियाल भारतीय जनता पार्टी
४१ पिण्डर (एससी) गोविन्द लाल भारतीय जनता पार्टी
४२ कपकोट भगत सिंह कोश्यारी भारतीय जनता पार्टी
४३ काण्डा बल्वन्त सिंह भौरियाल भारतीय जनता पार्टी
४४ बागेश्वर (एससी) चन्दन राम दास भारतीय जनता पार्टी
४५ द्वाराहाट पुष्पेश त्रिपाठी उत्तराखण्ड क्रान्ति दल
४६ भिकियासैंण सुरेन्द्र सिंह जीना भारतीय जनता पार्टी
४७ सल्ट रणजीत रावत कांग्रेस
४८ रानीखेत करण माहरा कांग्रेस
४९ सोमेश्वर (एससी) अजय टाम्टा भारतीय जनता पार्टी
५० अल्मोड़ा मनोज तिवारी कांग्रेस
५१ जागेश्वर गोविन्द सिंह कुञ्जवाल कांग्रेस
५२ मुक्तेश्वर (एससी) यशपाल आर्य कांग्रेस
५३ धारी गोविन्द सिंह बिष्ट भारतीय जनता पार्टी
५४ हल्द्वानी बंशीधर भगत भारतीय जनता पार्टी
५५ नैनीताल खड़क दिंह बोहरा भारतीय जनता पार्टी
५६ रामनगर श्री दीवान सिंह भारतीय जनता पार्टी
५७ जसपुर डॉ॰ शैलेन्द्र मोहन सिंघल कांग्रेस
५८ काशीपुर हरभजन सिंह चीमा भारतीय जनता पार्टी
५९ बाज़पुर अर्विन्द पाण्डे भारतीय जनता पार्टी
६० पंतनगर-ग़दरपुर प्रेमानन्द महाजन बहुजन समाज पार्टी
६१ रूद्रपुर-किच्छा तिलक राज बेहर कांग्रेस
६२ सितारगञ्ज (एससी) नारायण पाल बहुजन समाज पार्टी
६३ खटीमा (एसटी) गोपाल सिंह कांग्रेस
६४ चम्पावत वीणा महाराणा भारतीय जनता पार्टी
६५ लोहाघाट महेन्द्र सिंह मेहरा (माहू भाई) कांग्रेस
६६ पिथौड़ागढ़ प्रकाश पंत भारतीय जनता पार्टी
६७ गंगोलीहाट (एससी) जोगा राम टमटा भारतीय जनता पार्टी
६८ डिडिहाट बिशन सिंह चुफल भारतीय जनता पार्टी
६९ कनालीछिना मयुख सिंह कांग्रेस
७० धारचूला (एसटी) गगन सिंह निर्दलीय



उत्तराखण्ड विधानसभा चुनाव, २०१२

क्र0सं0 मा0 सदस्य का नाम निर्वाचन क्षेत्र द्ल
 1  श्री मालचंद  पुरोला  भारतीय जनता पार्टी
 2  श्री प्रीतम सिंह पंवार  यमुनोत्री  उक्रांद 
 3  श्री विजयपाल सिंह सजवाण  गंगोत्री  कांग्रेस
 4  श्री राजेन्द्र सिंह भण्डारी  बद्रीनाथ  कांग्रेस
 5  डा0 जीत राम  थराली  कांग्रेस
 6  डा0 अनुसूया प्रसाद मैखुरी  कर्णप्रयाग  कांग्रेस
 7  श्रीमती शैला रानी रावत*  केदारनाथ  भारतीय जनता पार्टी
 8  श्री हरक सिंह रावत*  रूद्रप्रयाग  कांग्रेस
 9  श्री भीमलाल आर्य**  घनसाली  भारतीय जनता पार्टी
 10  श्री मंत्री प्रसाद नैथानी  देवप्रयाग  निर्दलीय
 11  श्री सुबोध उनियाल*  नरेन्द्रनगर  भारतीय जनता पार्टी
 12  श्री विक्रम सिंह नेगी  प्रतापनगर  कांग्रेस
 13  श्री दिनेश धनै  टिहरी  निर्दलीय
 14  श्री महावीर सिंह  धनोल्टी  भारतीय जनता पार्टी
 15  श्री प्रीतम सिंह  चकराता  कांग्रेस
 16  श्री नवप्रभात  विकासनगर  कांग्रेस
 17  सहदेव सिंह पुण्डीर  सहसपुर  भारतीय जनता पार्टी
 18  श्री दिनेश अग्रवाल  धरमपुर  कांग्रेस
 19  श्री उमेश शर्मा (काऊ)*  रायपुर  भारतीय जनता पार्टी
 20  श्री राजकुमार  राजपुर रोड  कांग्रेस
 21  श्री हरबंस कपूर  देहरादून कैन्ट  भारतीय जनता पार्टी
 22  श्री गणेश जोशी  मसूरी  भारतीय जनता पार्टी
 23  श्री हीरा सिंह बिष्ट  डोईवाला  कांग्रेस
 24  श्री प्रेमचन्द अग्रवाल  ऋषिकेश  भारतीय जनता पार्टी
 25  श्री मदन कौशिक  हरिद्वार  भारतीय जनता पार्टी
 26  श्री आदेश चौहान  बी.एच.ई.एल.-रानीपुर  भारतीय जनता पार्टी
 27  श्री चन्द्र शेखर  ज्वालापुर  भारतीय जनता पार्टी
 28 श्रीमती ममता राकेश  भगवानपुर  कांग्रेस
 29  श्री हरिदास  झबरेड़ा  बसपा
 30  श्री फुरकान अहमद  पिरान कलियार  कांग्रेस
 31  श्री प्रदीप बत्रा*  रूड़की  भारतीय जनता पार्टी
 32  कुॅवर प्रणव सिंह चैम्पियन*  खानपुर  भारतीय जनता पार्टी
 33  श्री सरवत करीम अंसारी  मंगलौर  बसपा
 34  श्री संजय गुप्ता  लक्सर  भारतीय जनता पार्टी
 35  श्री यतीश्वरानन्द  हरिद्वार  भारतीय जनता पार्टी
 36  श्रीमती विजय बड़थ्वाल  यमकेश्वर  भारतीय जनता पार्टी
 37  श्री सुन्दर लाल मन्द्रवाल  पौड़ी  कांग्रेस
 38  श्री गणेश गोदियाल  श्रीनगर  कांग्रेस
 39  श्री तीरथ सिंह रावत  चौबट्टाखाल  भारतीय जनता पार्टी
 40  श्री दलीप सिंह रावत  लैन्सडौन  भारतीय जनता पार्टी
 41  श्री सुरेन्द्र सिंह नेगी  कोटद्वार  कांग्रेस
 42  श्री हरीश रावत  धारचूला  कांग्रेस
 43  श्री विशन सिंह चुफाल   डीडीहाट  भारतीय जनता पार्टी
 44  श्री मयूख सिंह  पिथौरागढ़  कांग्रेस
 45  श्री नारायणराम आर्य  गंगोलीहाट  कांग्रेस
 46  श्री ललित फर्स्वाण   कपकोट  कांग्रेस
 47  श्री चन्दन राम दास   बागेश्वर  भारतीय जनता पार्टी
 48  श्री मदन सिंह बिष्ट   द्वाराहाट  कांग्रेस
 49  श्री सुरेन्द्र सिंह जीना  सल्ट   भारतीय जनता पार्टी
 50  श्री अजय भट्ट  रानीखेत   भारतीय जनता पार्टी
 51  श्रीमती रेखा आर्य***  सोमेश्वर   भारतीय जनता पार्टी
 52  श्री मनोज तिवारी  अल्मोड़ा  कांग्रेस
 53  श्री गोविन्द सिंह कुंजवाल  जागेश्वर  कांग्रेस
 54  श्री पूरन सिंह फर्त्याल  लोहाघाट  भारतीय जनता पार्टी
 55  श्री हेमेश खर्कवाल  चम्पावत  कांग्रेस
 56  श्री हरीश चन्द दुर्गापाल  लालकुवां  निर्दलीय
 57  श्री दान सिंह भण्डारी****  भीमताल  भारतीय जनता पार्टी
 58  श्रीमती सरिता आर्य  नैनीताल  कांग्रेस
 59  श्रीमती इन्दिरा हृदयेश  हल्द्वानी  कांग्रेस
 60  श्री बंशीधर भगत  कालाढूंगी  भारतीय जनता पार्टी
 61  श्रीमती अमृता रावत*  रामनगर  भारतीय जनता पार्टी
 62  डा0 शैलेन्द्र मोहन सिंधल*  जसपुर  भारतीय जनता पार्टी
 63  श्री हरभजन सिंह चीमा  काशीपुर  भारतीय जनता पार्टी
 64  श्री यशपाल आर्य  बाजपुर  कांग्रेस
 65  श्री अरविन्द पाण्डे  गदरपुर  भारतीय जनता पार्टी
 66  श्री राकुमार ठुकराल  रूद्रपुर  भारतीय जनता पार्टी
 67  श्री राजेश शुक्ला  किच्छा  भारतीय जनता पार्टी
 68  श्री विजय बहुगुणा*  सितारगंज  भारतीय जनता पार्टी
 69  डा0 प्रेम सिंह राणा  नानकमत्ता  भारतीय जनता पार्टी
 70  श्री पुष्कर सिंह धामी  खटीमा  भारतीय जनता पार्टी
 71  श्री रस्सैल वेलैन्टाइन गार्डनर  नामित  नामित
क्रमनिर्वाचन क्षेत्रनिर्वाचित सांसदराजनैतिक दल
टिहरी गढ़वाल माला राज्यलक्ष्मी शाह भारतीय जनता पार्टी
गढ़वाल भुवन चन्द्र खण्डूरी भारतीय जनता पार्टी
अल्मोड़ा अजय टम्टा भारतीय जनता पार्टी
नैनीताल-ऊधमसिंह नगर भगत सिंह कोश्यारी भारतीय जनता पार्टी
हरिद्वार रमेश पोखरियाल भारतीय जनता पार्टी

उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलन, उत्तराखण्ड राज्य के बनने से पहले की वे घटनाएँ हैं जो अन्ततः उत्तराखण्ड राज्य के रूप में परिणीत हुईं। राज्य का गठन ९ नवम्बर, २००० को भारत के सत्ताइसवें राज्य के रूप में हुआ। यहाँ पर यह उल्लेखनीय है कि उत्तराखण्ड राज्य का गठन बहुत लम्बे संघर्ष और बलिदानों के फलस्वरूप हुआ। उत्तराखण्ड राज्य की माँग सर्वप्रथम १८९७ में उठी और धीरे-धीरे यह माँग अनेकों समय पर उठती रही।१९९४ में इस माँग ने जनान्दोलन का रूप ले लिया और अन्ततः नियत तिथि पर यह देश का सत्ताइसवाँ राज्य बना।

संक्षिप्त इतिहास उत्तराखण्ड संघर्ष से राज्य के गठन तक जिन महत्वपूर्ण तिथियों और घटनाओं ने मुख्य भूमिका निभाई वे इस प्रकार हैं -

राज्य आन्दोलन की घटनाएँ

उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलन में बहुत सी हिंसक घटनाएँ भी हुईं जो इस प्रकार हैं:

  • भारतीय स्वतंत्रता आन्देालन की एक इकाई के रूप में उत्तराखंड में स्वाधीनता संग्राम के दौरान १९१३ के कांग्रेस अधिवेशन में उत्तराखण्ड के अधिकांश प्रतिनिधि सम्मिलित हुए। इसी वर्ष उत्तराखण्ड के अनुसूचित जातियों के उत्थान के लिये गठित टम्टा सुधारिणी सभा का रूपान्तरण एक व्यापक शिल्पकार महासभा के रूप में हुआ।

  • १९१६ के सितम्बर माह में गोविन्द बल्लभ पंत, हरगोबिन्द पंत, बद्री दत्त पाण्डेय, इन्द्र लाल शाह, मोहन सिंह दड़मवाल, चन्द्र लाल शाह, प्रेम बल्लभ पाण्डेय, भोला दत्त पाण्डेय और लक्ष्मी दत्त शास्त्री आदि उत्साही युवकों के द्वारा कुमाऊँ परिषद् की स्थापना की गई जिसका मुख्य उद्देश्य तत्कालीन उत्तराखण्ड की सामाजिक तथा आर्थिक समस्याओं का समाधान खोजना था। १९२६ तक इस संगठन ने उत्तराखण्ड में स्थानीय सामान्य सुधारों की दिशा के अतिरिक्त निश्चित राजनैतिक उद्देश्य के रूप में संगठनात्मक गतिविधियाँ संपादित कीं। १९२३ तथा १९२६ के प्रान्तीय षरिषद् के चुनाव में गोविन्द बल्लभ पंत हरगोविन्द पंत, मुकुन्दी लाल तथा बद्री दत्त पाण्डेय ने प्रतिपक्षियों को बुरी तरह पराजित किया।

  • १९२६ में कुमाऊँ परिषद् का कांग्रेस में विलीनीकरण कर दिया गया।

  • आधिकारिक सूत्रों के अनुसार मई १९३८ में तत्कालीन ब्रिटिश शासन में गढ़वाल के श्रीनगर में आयोजित कांग्रेस के अधिवेशन में पण्डित जवाहर लाल नेहरू ने इस पर्वतीय क्षेत्र के निवासियों को अपनी परिस्थितियों के अनुसार स्वयं निर्णय लेने तथा अपनी संस्कृति को समृद्ध करने के आंदोलन का समर्थन किया।

  • सन् १९४० में हल्द्वानी सम्मेलन में बद्री दत्त पाण्डेय ने पर्वतीय क्षेत्र को विशेष दर्जा तथा अनुसूया प्रसाद बहुगुणा ने कुमाऊँ-गढ़वाल को पृथक इकाई के रूप में गठन करने की माँग रखी। १९५४ में विधान परिषद के सदस्य इन्द्र सिंह नयाल ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमन्त्री गोविन्द बल्लभ पंत से पर्वतीय क्षेत्र के लिये पृथक विकास योजना बनाने का आग्रह किया तथा १९५५ में फ़ज़ल अली आयोग ने पर्वतीय क्षेत्र को अलग राज्य के रूप में गठित करने की संस्तुति की।

  • वर्ष १९५७ में योजना आयोग के उपाध्यक्ष टी. टी. कृष्णमाचारी ने पर्वतीय क्षेत्र की समस्याओं के निदान के लिये विशेष ध्यान देने का सुझाव दिया। १२ मई, १९७० को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा पर्वतीय क्षेत्र की समस्याओं का निदान राज्य तथा केन्द्र सरकार का दायित्व होने की घोषणा की गई और २४ जुलाई, १९७९ को पृथक राज्य के गठन के लिये मसूरी में उत्तराखण्ड क्रान्ति दल की स्थापना की गई। जून १९८७ में कर्णप्रयाग के सर्वदलीय सम्मेलन में उत्तराखण्ड के गठन के लिये संघर्ष का आह्वान किया तथा नवंबर १९८७ में पृथक उत्तराखण्ड राज्य के गठन के लिये नई दिल्ली में प्रदर्शन और राष्ट्रपति को ज्ञापन एवं हरिद्वार को भी प्रस्तावित राज्य में सम्मिलित करने की माँग की गई।

  • १९९४ उत्तराखण्ड राज्य एवं आरक्षण को लेकर छात्रों ने सामूहिक रूप से आन्दोलन किया। मुलायम सिंह यादव के उत्तराखण्ड विरोधी वक्तव्य से क्षेत्र में आन्दोलन तेज़ हो गया। उत्तराखण्ड क्रान्ति दल के नेताओं ने अनशन किया। उत्तराखण्ड में सरकारी कर्मचारी पृथक राज्य की माँग के समर्थन में लगातार तीन महीने तक हड़ताल पर रहे तथा उत्तराखण्ड में चक्काजाम और पुलिस फ़ायरिंग की घटनाएँ हुईं। उत्तराखण्ड आन्दोलनकारियों पर मसूरी और खटीमा में पुलिस द्वारा गोलियाँ चलाईं गईं। संयुक्त मोर्चा के तत्वाधान में २ अक्टूबर, १९९४ को दिल्ली में भारी प्रदर्शन किया गया। इस संघर्ष में भाग लेने के लिये उत्तराखण्ड से हज़ारों लोगों की भागीदारी हुई। प्रदर्शन में भाग लेने जा रहे आन्दोलनकारियों को मुजफ्फर नगर में बहुत प्रताड़ित किया गया और उन पर पुलिस ने गोलीबारी की और लाठियाँ बरसाईं तथा महिलाओं के साथ दुराचार और अभद्रता की गयी। इसमें अनेक लोग हताहत और घायल हुए। इस घटना ने उत्तराखण्ड आन्दोलन की आग में घी का काम किया। अगले दिन तीन अक्टूबर को इस घटना के विरोध में उत्तराखण्ड बंद का आह्वान किया गया जिसमें तोड़फोड़ गोलीबारी तथा अनेक मौतें हुईं।

  • ७ अक्टूबर, १९९४ को देहरादून में एक महिला आन्दोलनकारी की मृत्यु हो हई इसके विरोध में आन्दोलनकारियों ने पुलिस चौकी पर उपद्रव किया।

  • १५ अक्टूबर को देहरादून में कर्फ़्यू लग गया और उसी दिन एक आन्दोलनकारी शहीद हो गया।

  • २७ अक्टूबर, १९९४ को देश के तत्कालीन गृहमंत्री राजेश पायलट की आन्दोलनकारियों की वार्ता हुई। इसी बीच श्रीनगर में श्रीयंत्र टापू में अनशनकारियों पर पुलिस ने बर्बरतापूर्वक प्रहार किया जिसमें अनेक आन्दोलनकारी शहीद हो गए।

  • १५ अगस्त, १९९६ को तत्कालीन प्रधानमंत्री एच. डी. देवेगौड़ा ने उत्तराखण्ड राज्य की घोषणा लाल क़िले से की।

  • १९९८ में केन्द्र की भाजपा गठबन्धन सरकार ने पहली बार राष्ट्रपति के माध्यम से उ.प्र. विधानसभा को उत्तरांचल विधेयक भेजा। उ.प्र. सरकार ने २६ संशोधनों के साथ उत्तरांचल राज्य विधेयक विधान सभा में पारित करवाकर केन्द्र सरकार को भेजा। केन्द्र सरकार ने २७ जुलाई, २००० को उत्तर प्रदेश पुनर्गठन विधेयक २००० को लोकसभा में प्रस्तुत किया जो १ अगस्त, २००० को लोकसभा में तथा १० अगस्त, २००० अगस्त को राज्यसभा में पारित हो गया। भारत के राष्ट्रपति ने उत्तर प्रदेश पुनर्गठन विधेयक को २८ अगस्त, २००० को अपनी स्वीकृति दे दी और इसके बाद यह विधेयक अधिनियम में बदल गया और इसके साथ ही ९ नवम्बर २००० को उत्तरांचल राज्य अस्तित्व में आया जो अब उत्तराखण्ड नाम से अस्तित्व में है।

राज्य आन्दोलन की घटनाएँ

खटीमा गोलीकाण्ड

१ सितम्बर, १९९४ को उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलन का काला दिवस माना जाता है, क्योंकि इस दिन जैसी पुलिस की बर्बरतापूर्ण कार्यवाही इससे पहले कहीं और देखने को नहीं मिली थी। पुलिस द्वारा बिना चेतावनी दिए ही आन्दोलनकारियों के ऊपर अंधाधुंध फ़ायरिंग की गई, जिसके परिणामस्वरुप सात आन्दोलनकारियों की मृत्यु हो गई। खटीमा गोलीकाण्ड में मारे गए शहीद:

  • अमर शहीद स्व० भगवान सिंह सिरौला, ग्राम श्रीपुर बिछुवा, खटीमा
  • अमर शहीद स्व० प्रताप सिंह, खटीमा
  • अमर शहीद स्व० सलीम अहमद, खटीमा
  • अमर शहीद स्व० गोपीचन्द, ग्राम रतनपुर फुलैया, खटीमा
  • अमर शहीद स्व० धर्मानन्द भट्ट, ग्राम अमरकलाँ, खटीमा
  • अमर शहीद स्व० परमजीत सिंह, राजीवनगर, खटीमा
  • अमर शहीद स्व० रामपाल, बरेली

इस पुलिस फायरिंग में बिचपुरी निवासी श्री बहादुर सिंह और श्रीपुर बिछुवा निवासी श्री पूरन चन्द भी गम्भीर रुप से घायल हुए थे।

मसूरी गोलीकाण्ड

२ सितम्बर, १९९४ को खटीमा गोलीकाण्ड के विरोध में मौन जुलूस निकाल रहे लोगों पर एक बार फिर पुलिसिया क़हर टूटा। प्रशासन से बातचीत करने गई दो सगी बहनों को पुलिस ने झूलाघर स्थित आन्दोलनकारियों के कार्यालय में गोली मार दी। इसका विरोध करने पर पुलिस द्वारा अंधाधुंध फ़ायरिंग कर दी गई, जिसमें कई (लगभग २१) लोगों को गोली लगी और इसमें से चार आन्दोलनकारियों की अस्पताल में मृत्यु हो गई।

मसूरी गोलीकाण्ड में मारे गए शहीद:

  • अमर शहीद स्व० बेलमती चौहान (४८), पत्नी श्री धर्म सिंह चौहान, ग्राम खलोन, पट्टी घाट, अकोदया, टिहरी
  • अमर शहीद स्व०हंसा धनई (४५), पत्नी श्री भगवान सिंह धनई, ग्राम बंगधार, पट्टी धारमण्डल, टिहरी
  • अमर शहीद स्व० बलबीर सिंह नेगी (२२), पुत्र श्री भगवान सिंह नेगी, लक्ष्मी मिष्ठान्न भण्डार, लाइब्रेरी, मसूरी
  • अमर शहीद स्व० धनपत सिंह (५०), ग्राम गंगवाड़ा, पट्टी गंगवाड़स्यूँ, टिहरी
  • अमर शहीद स्व० मदन मोहन ममगाईं (४५), ग्राम नागजली, पट्टी कुलड़ी, मसूरी
  • अमर शहीद स्व० राय सिंह बंगारी (५४), ग्राम तोडेरा, पट्टी पूर्वी भरदार, टिहरी

रामपुर तिराहा (मुज़फ़्फ़रनगर) गोलीकाण्ड

२ अक्टूबर, १९९४ की रात्रि को दिल्ली रैली में जा रहे आन्दोलनकारियों का रामपुर तिराहा, मुज़फ़्फ़रनगर में पुलिस-प्रशासन ने जैसा दमन किया, उसका उदारहण किसी भी लोकतान्त्रिक देश तो क्या किसी तानाशाह ने भी आज तक दुनिया में नहीं दिया होगा, कि निहत्थे आन्दोलनकारियों को रात के अन्धेरे में चारों ओर से घेरकर गोलियाँ बरसाई गईं और पहाड़ की सीधी-सादी महिलाओं के साथ दुष्कर्म तक किया गया। इस गोलीकाण्ड में राज्य के ७ आन्दोलनकारी शहीद हो गए थे। इस गोलीकाण्ड के दोषी आठ पुलिसवालों पर, जिनमें तीन पुलिस अधिकारी भी हैं, पर मामला चलाया जा रहा है।[1] रामपुर तिराहा गोलीकाण्ड में मारे गए शहीदः

  • अमर शहीद स्व० सूर्यप्रकाश थपलियाल (२०), पुत्र श्री चिन्तामणि थपलियाल, चौदह बीघा, मुनि की रेती, ऋषिकेश
  • अमर शहीद स्व० राजेश लखेड़ा (२४), पुत्र श्री दर्शन सिंह लखेड़ा, अजबपुर कलाँ, देहरादून
  • अमर शहीद स्व० रवीन्द्र सिंह रावत (२२), पुत्र श्री कुन्दन सिंह रावत, बी-२०, नेहरू कॉलोनी, देहरादून।
  • अमर शहीद स्व० राजेश नेगी (२०), पुत्र श्री महावीर सिंह नेगी, भानियावाला, देहरादून।
  • अमर शहीद स्व० सतेन्द्र चौहान (१६), पुत्र श्री जोध सिंह चौहान, ग्राम हरिपुर, सेलाक़ुईं, देहरादून।
  • अमर शहीद स्व० गिरीश भद्री (२१), पुत्र श्री वाचस्पति भद्री, अजबपुर ख़ुर्द, देहरादून।
  • अमर शहीद स्व० अशोक कुमार कैशिव, पुत्र श्री शिव प्रसाद कैशिव, मन्दिर मार्ग, ऊखीमठ, रुद्रप्रयाग।

देहरादून गोलीकाण्ड

३ अक्टूबर, १९९४ को रामपुर तिराहा गोलीकाण्ड की सूचना देहरादून में पहुँचते ही लोगों का उग्र होना स्वाभाविक था। इसी बीच इस काण्ड में शहीद स्व० श्री रवीन्द्र सिंह रावत की शवयात्रा पर पुलिस के लाठीचार्ज के बाद स्थिति और उग्र हो गई और लोगों ने पूरे देहरादून में इसके विरोध में प्रदर्शन किया, जिसमें पहले से ही जनाक्रोश को किसी भी हालत में दबाने के लिये तैयार पुलिस ने फ़ायरिंग कर दी, जिसने तीन और लोगों को इस आन्दोलन में शहीद कर दिया। देहरादून गोलीकाण्ड में मारे गए शहीद:

  • अमर शहीद स्व० बलवन्त सिंह सजवाण (४५), पुत्र श्री भगवान सिंह सजवाण ग्राम मल्हान, नयागाँव, देहरादून
  • अमर शहीद स्व० दीपक वालिया (२७), पुत्र श्री ओम प्रकाश वालिया, ग्राम बद्रीपुर, देहरादून
  • अमर शहीद स्व० राजेश रावत (१९), पुत्र श्रीमती आनन्दी देवी, २७-चंद्र रोड, नई बस्ती, देहरादून

स्व० राजेश रावत की मृत्यु तत्कालीन समाजवादी पार्टी नेता सूर्यकान्त धस्माना के घर से हुई फ़ायरिंग में हुई थी।

कोटद्वार काण्ड

३ अक्टूबर १९९४ को पूरा उत्तराखण्ड रामपुर तिराहा काण्ड के विरोध में उबला हुआ था और पुलिस-प्रशासन किसी भी प्रकार से इसके दमन के लिये तैयार था। इसी कड़ी में कोटद्वार में भी आन्दोलन हुआ, जिसमें दो आन्दोलनकारियों को पुलिसकर्मियों द्वारा राइफ़ल के बटों व डण्डों से पीट-पीटकर मार डाला गया

कोटद्वार काण्ड में मारे गए शहीद:

  • अमर शहीद स्व० राकेश देवरानी
  • अमर शहीद स्व० पृथ्वी सिंह बिष्ट, मानपुर ख़ुर्द, कोटद्वार

नैनीताल गोलीकाण्ड

नैनीताल में भी विरोध चरम पर था, लेकिन इसका नेतृत्व बुद्धिजीवियों के हाथ में होने के कारण पुलिस कुछ कर नहीं पाई, लेकिन इसकी भड़ास उन्होंने निकाली होटल प्रशान्त में काम करने वाले प्रताप सिंह के ऊपर। आर०ए०एफ० के सिपाहियों ने इन्हें होटल से खींचा और जब ये बचने के लिये होटल मेघदूत की तरफ़ भागे, तो इनकी गर्दन में गोली मारकर हत्या कर दी गई।

नैनीताल गोलीकाण्ड में मारे गए शहीद:

  • अमर शहीद स्व० प्रताप सिंह

श्रीयन्त्र टापू (श्रीनगर) काण्ड

श्रीनगर शहर से २ कि०मी० दूर स्थित श्रीयन्त्र टापू पर आन्दोलनकारियों ने ७ नवम्बर, १९९४ से इन सभी दमनकारी घटनाओं के विरोध और पृथक उत्तराखण्ड राज्य हेतु आमरण अनशन आरम्भ किया। १० नवम्बर, १९९४ को पुलिस ने इस टापू में पहुँचकर अपना क़हर बरपाया, जिसमें कई लोगों को गम्भीर चोटें भी आई, इसी क्रम में पुलिस ने दो युवकों को राइफ़लों के बट और लाठी-डण्डों से मारकर अलकनन्दा नदी में फेंक दिया और उनके ऊपर पत्थरों की बरसात कर दी, जिससे इन दोनों की मृत्यु हो गई।

श्रीयन्त्र टापू में मारे गए शहीद:

  • अमर शहीद स्व० राजेश रावत
  • अमर शहीद स्व० यशोधर बेंजवाल

इन दोनों शहीदों के शव १४ नवम्बर, १९९४ को बागवान के समीप अलकनन्दा नदी में तैरते हुए पाए गए थे।

नये राज्य का उदयः

9 नवंबर सन्‌ 2000 को भारत के सत्ताईसवें राज्‍य के रूप में उत्तरांचल (अब उत्तराखण्ड) नाम से इस प्रदेश का जन्‍म हुआ , इससे पहले ये उत्तर प्रदेश का ही एक हिस्‍सा था। यह 13 जिलों में विभक्त है, 7 गढ़वाल में - देहरादून , उत्तरकाशी , पौड़ी , टेहरी (अब नई टेहरी) , चमोली , रूद्रप्रयाग और हरिद्वार और 6 कुमाऊँ में अल्‍मोड़ा , रानीखेत , पिथौरागढ़ , चम्‍पावत , बागेश्‍वर और उधम सिंह नगर । यह पूर्व में नेपाल , उत्तर में चीन , पश्‍चिम में हिमाचल प्रदेश और दक्षिण में उत्तर प्रदेश से घिरा हुआ है। इस क्षेत्र की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि धरातल पर यदि कहीं समाजवाद दिखाई देता है तो वह इस क्षेत्र में देखने को मिलता है इसलिए यहाँ की संस्कृति संसार की श्रेष्ठ संस्कृतियों में मानी जाती है। इस भूमि की पवित्रता एवं प्राकृतिक विशेषता के कारण यहाँ के निवासीयों में भी इसका प्रभाव परिलक्षित होता है अर्थात् प्रकृति प्रदत शिक्षण द्वारा यहाँ के निवासी ईमानदार, सत्यवादी, शांत स्वभाव, निश्छल, कर्मशील एवं ईश्वर प्रेमी होते हैं।

उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलन >>

उत्तराखण्ड का इतिहास एंव परिचय

भारत का शीर्ष भाग उत्तराखण्ड के नाम से जाना जाता है। जिसका उल्लेख वेद, पुराणों विशेषकर केदारखण्ड में पाया जाता है। देवताओं की आत्मा हिमालय के मध्य भाग में गढ़वाल अपने ऐतिहासिक एंव सांस्कृतिक महत्व तथा प्राकृतिक सौंदर्य में अद्भुत है। 55845 कि. मी. में फैला उत्तराखण्ड जहाँ 80 लाख जनसंख्या निवास करती है, उत्तरांचल दो शब्‍दों के मिलाने से मिला है - उत्तर यानि कि नोर्थ और अंचल यानि कि रीजन , भारत के उत्तर की तरफ फैला प्रान्‍त यानि कि उत्तरांचल। इसी उत्तराखण्ड में आदिगुरू शंकाराचार्य ने स्वर्गीय आभाh3 वाले बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री, यमुनोत्री चारों धामों की स्थापना करके भारतीय संस्कृति के समन्वय की अद्भुत मिसाल कायम की है। ये चारों धाम की स्थापना करके भारत वासियों के ही नहीं विश्व जनमास के श्रद्धा विश्वास के धर्म स्थल हैं। यहाँ भिन्न- भिन्न जातियों के पशु-पक्षी, छोटी- छोटी नदीयां, पनी के प्राकृतिक झरने, बाँज, बुरॉस, देवदार के हरे पेड़, उँची- उँची चोटीयों पर सिद्धपीठ, प्राकृतिक सुन्दरता से भरपूर शहर, हरिद्वार, ऋषिकेश जौसे धार्मिक नगर, माँ गंगा, यमुना जैसी पवित्र नदियाँ अपनी कल-कल ध्वनी करती हुई युगों से लाखों जीवों की प्राण रक्षा का भार उठाते हुए सम्पूर्ण मलिनताओं को धोते हुए अंतिम गंतव्य तक पंहुचती हैं।

हिमालय पर्वत की बर्फ से अच्छादित चोटियाँ तथा ऋतुओं के परिवर्तन के अद्वितीय सौंदर्य को देखकर मानव, देवता, किन्नर, गंधर्व ही नहीं पशु-पक्षी भी यही अभिलाषा रखते हैं कि वे अपना निवास इसी पवित्र धरती को बनाएं। महान संतों, देवताओं, ऋषियों, मुनियों, योगीयों, तपस्वीयों, ईश्वरीय अवतारों की तपो स्थली होने के कारण यह भूमि देव भूमि के नाम से विख्यात है। इस भूमि की पवित्रता एवं प्राकृतिक विशेषता के कारण यहाँ के निवासीयों में भी इसका प्रभाव परिलक्षित होता है अर्थात् प्रकृति प्रदत शिक्षण द्वारा यहाँ के निवासी ईमानदार, सत्यवादी, शांत स्वभाव, निश्छल, कर्मशील एवं ईश्वर प्रेमी होते हैं। इन गुणों को किसी के द्वारा सिखाने की आवश्यकता नहीं होती है अपितु वे स्वाभाविक रूप से उक्त गुणों के धनी होते हैं।

उत्तराखण्ड का इतिहास उतना ही पुराना है जितना कि मानव जाति का। यहाँ कई शिलालेख, ताम्रपत्र व प्राचीन अवशेष भी प्राप्त हुए हैं। जिससे गढ़वाल की प्राचीनता का पता चलता है। गोपेश्नर में शिव-मंदिर में एक शिला पर लिखे गये लेख से ज्ञात होता है कि कई सौ वर्ष से यात्रियों का आवागमन इस क्षेत्र में होता आ रहा है। मार्कण्डेय पुराण, शिव पुराण, मेघदूत व रघुवंश महाकाव्य में यहाँ की सभ्यता व संस्कृति का वर्णन हुआ है। बौधकाल, मौर्यकाल व अशोक के समय के ताम्रपत्र भी यहाँ मिले हैं। इस भूमी का प्राचीन ग्रन्थों में देवभूमि या स्वर्गद्वार के रूप में वर्णन किया गया है। पवित्र गंगा हरिद्वार में मैदान को छूती है। प्राचीन धर्म ग्रन्थों में वर्णित यही मायापुर है। गंगा यहाँ भौतिक जगत में उतरती है। इससे पहले वह सुर-नदी देवभूमि में विचरण करती है। इस भूमी में हर रूप शिव भी वास करते हैं, तो हरि रूप में बद्रीनारायण भी। माँ गंगा का यह उदगम क्षेत्र उस देव संस्कृति का वास्तविक क्रिड़ा क्षेत्र रहा है जो पौराणिक आख्याओं के रूप में आज भी धर्म-परायण जनता के मानस में विश्वास एवं आस्था के रूप में जीवित हैं। उत्तराखण्ड की प्राचीन जातियों में किरात, यक्ष, गंधर्व, नाग, खस, नाथ आदी जातियों का विशेष उल्लेख मिलता है। आर्यों की एक श्रेणी गढ़वाल में आई थी जो खस (खसिया) कहलाई। यहाँ की कोल भील, जो जातियाँ थी कालांतर में स्वतंत्रता प्राप्ति के बात हरिजन कहलाई। देश के विभिन्न क्षेत्रों से लोग यात्री के रूप में बद्रीनारायण के दर्शन के लिए आये उनमें से कई लोग यहाँ बस गये और उत्तराखण्ड को अपना स्थायी निवास बना दिया। ब्राह्मण, क्षत्रीय, वैश्य, मुस्लिम, सिख, ईसाई सभी यहाँ रहने लगे। मुख्य रूप से इस क्षेत्र में ब्राह्मण एवं क्षत्रीय जाति के लोगों का निवास अधिक है। उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद हरिद्वार, उधमसिंह नगर एवं कुछ अन्य क्षेत्रों को मिलाने से अन्य जाती के लोगों में अब बढोत्री हो गई है। इस क्षेत्र की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि धरातल पर यदि कहीं समाजवाद दिखाई देता है तो वह इस क्षेत्र में देखने को मिलता है इसलिए यहाँ की संस्कृति संसार की श्रेष्ठ संस्कृतियों में मानी जाती है। सातवीं सदी के गढ़वाल का एतिहासिक विवरण प्राप्त है। 688 ई0 के आसपास चाँदपुर, गढ़ी (वर्तमान चमोली जिले में कर्णप्रयाग से 13 मील पूर्व ) में राजा भानुप्रताप का राज्य था। उसकी दो कन्यायें थी। प्रथम कन्या का विवाह कुमाऊं के राजकुमार राजपाल से हुआ तथा छोटी का विवाह धारा नगरी के राजकुमार कनकपाल से हुआ इसी का वंश आगे बढा।

महाराजा कनकपाल का समय

कनकपाल ने 756 ई0 तक चाँदपुर गढ़ी में राज किया। कनकपाल की 37 वीं पीढ़ी में महाराजा अजयपाल का जन्म हुआ। इस लम्बे अंतराल में कोई शक्तिशाली राजा नहीं हुआ। गढ़वाल छोटे-छोटे ठाकुरी गढ़ों में बंटा था, जो आपस में लड़ते रहते थे। कुमाऊं के कत्यूरी शासक भी आक्रमण करते रहते थे। कत्यूरियों मे ज्योतिष्पुर (वर्तमान जोशीमठ) तक अधिकार कर लिया था।

महाराजा अजयपाल का समय

राजा कनकपाल की 37 वीं पीढ़ी में 1500 ई0 के महाराजा अजयपाल नाम के प्रतापी राजा हुए। गढ़वाल राज्य की स्थापना का महान श्रेय इन्ही को है। इन्होने 52 छोटे-छोटे ठाकुरी गढ़ों को जीतकर एक शक्तिशाली गढ़वाल का अर्थ है, गढ़­­ = किला, वाल = वाला अर्थात किलों का समुह। कुमाऊं के राजा कीर्तिचन्द व कत्यूरियों के आक्रमण से त्रस्त होकर महाराजा अजयपाल ने 1508 ई0 के आसपास अपनी राजधानी चाँदपुर गढ़ी से देवलगढ़ तथा 1512 ई0 में देवलगढ़ से श्रीनगर में स्थापित की। इनके शासनकाल में गढ़वाल की सामाजिक, राजनैतिक व धार्मिक उन्नति हुई।

शाह की उपाधिः महाराजा अजयपाल की तीसरी पीढ़ी में बलभद्र हुए। ये दिल्ली के शंहशाह अकबर के समकालीन थे, कहते हैं कि एक बार नजीबाबाद के निकट शिकार खेलते समय बलभद्र ने शेर के आक्रमण से दिल्ली के शंहशाह की रक्षा की। इसलिए उन्हे शाह की उपाधि प्राप्त हुई, तबसे 1948 तक गढ़वाल के राजाओं के साथ शाह की उपाधि जुड़ी रही।

गढ़वाल का विभाजनः -1803 में महाराजा प्रद्दुम्न शाह संपूर्ण गढ़वाल के अंतिम नरेश थे जिनकी राजधानी श्रीनगर थी। गोरखों के आक्रमण और संधि-प्रस्ताव के आधार पर प्रति वर्ष 25000 /- रूपये कर के रूप में गोरखों को देने के कारण राज्य की आर्थिक स्थिति दयनीय हो गई थी। इसी अवसर का लाभ उठाकर गोरखों ने दूसरी बार गढ़वाल पर आक्रमण किया और पूरे गढ़वाल को तहस-नहस कर डाला। राजा प्रद्दुम्न शाह देहरादून के खुड़ब़ड़ा के युद्ध में लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए और गढ़वाल में गोरखों का शासन हो गया। इसके साथ ही गढ़वाल दो भागों में विभाजित हो गया।

गढ़वाल रियासत (टिहरी गढ़वाल)- महाराजा प्रद्दुम्न शाह की मृत्यू के बाद इनके 20 वर्षिय पुत्र सुदर्शन शाह इनके उत्तराधिकारी बने। सुदर्शन शाह ने बड़े संघर्ष और ब्रिटिश शासन की सहयाता से, जनरल जिलेस्पी और जनरल फ्रेजर के युद्ध संचालन के बल पर गढ़वाल को गोरखों की अधीनता से मुक्त करवाया। इस सहयाता के बदले अंग्रेजों ने अलकनंदा व मंदाकिनी के पूर्व दिशा का सम्पूर्ण भाग ब्रिटिश साम्राज्य में मिला दिया, जिससे यह क्षेत्र ब्रिटिश गढ़वाल कहलाने लगा और पौड़ी इसकी राजधानी बनी।

टिहरी गढ़वाल-

महाराजा सुदर्शन शाह ने भगिरथी और भिलंगना के सगंम पर अपनी राजधानी बसाई, जिसका नाम टिहरी रखा। राजा सुदर्शन शाह के पश्चात क्रमशः भवानी शाह ( 1859-72), प्रताप शाह (1872-87), कीर्ति शाह (1892-1913), नरेन्द्र शाह (1916-46) टिहरी रीयासत की राजगद्दी पर बैठे। महाराजा प्रताप शाह तथा कीर्ति शाह की मृत्यु के समय उत्तराधिकारियों के नबालिग होने के कारण तत्कालीन राजमाताओं ने क्रमशः राजमाता गुलेरिया तथा राजमाता नैपालिया ने अंग्रेज रिजेडेन्टों की देख-रेख में (1887-92) तथा (1913-1916) तक शासन का भार संभाला। रियासत के अंतिम राजा मानवेन्द्र शाह के समय सन् 1949 में रियासत भारतीय गणतंत्र में विलीन हो गई।
द्वारा जय सिंह नेगी

उत्तराखण्ड के जिलेः

उत्तराखण्ड को 13 जिलों में विभक्त किया गया है 7 गढ़वाल में - देहरादून , उत्तरकाशी , पौड़ी , टेहरी (अब नई टेहरी) , चमोली , रूद्रप्रयाग और हरिद्वार और 6 कुमाऊँ में अल्‍मोड़ा , रानीखेत , पिथौरागढ़ , चम्‍पावत , बागेश्‍वर और उधम सिंह नगर ।

पौड़ी गढ़वाल

यह कान्डोंलिया पर्वत के उतर तथा समुद्रतल से 5950 फुट की ऊँचाई पर स्थित है। यहां से मुख्य शहर कोटद्वार, पाबौ, पैठाणी, थैलीसैण, घुमाकोट, श्रीनगर, दुगड्डा, सतपुली इत्यादी हैं। ब्रिटीश शासनकाल में यहाँ राज्सव इकट्ठा करने का मुख्य केन्द्र था। यहाँ पं. गोविन्द वल्लभ पंत इंजिनियरिंग कालेज भी है। इतिहासकारों के अनुसार गढ़वाल में कभी 52 गढ़ थे जो गढ़वाल के पंवार पाल और शाह शासकों ने समय समय पर बनाये थे। इनमें से अधिकांश पौड़ी में आते हैं। यहाँ से 2 कि. मी. की दूरी पर स्थित क्युंकलेश्वर महादेव पौड़ी का मुख्य दर्शनीय स्थल है जो कि 8वीं शताब्दी में निर्मित भगवान शिव का मंदिर है। यंहा से श्रीनगर घाटी और हिमालय का मनोरम दृष्य दिखाई देता है। यहाँ पर कण्डोलिया देवता और नाग देवता के मंदिर भी धार्मिक आस्था के प्रतीक हैं। यहाँ से ज्वालपा देवी का मंदिर शहर से 34 कि. मी. दूर है। यहाँ प्रतिवर्ष नवरात्रियों के अवसर पर दूर दूर से श्रद्धालु दर्शन और पूजा के लिए आते हैं। यहां का निकटतम रेलवे स्टेशन कोटद्वार 100 कि. मी. और ऋषिकेश से 142 कि. मी.की दूरी पर स्थित है।

उत्तराखण्ड की प्रमख नदियां

गंगा, यमुना, काली, रामगंगा, भागीरथी, अलकनन्दा, कोसी, गोमती, टौंस, मंदाकिनी, धौली गंगा, गौरीगंगा, पिंडर नयार(पू) पिंडर नयार (प) आदी प्रमुख नदीयां हैं।

उत्तराखण्ड के प्रमुख हिमशिखर

गंगोत्री (6614), दूनगिरि (7066), बंदरपूछ (6315), केदारनाथ (6490), चौखंवा (7138), कामेत (7756), सतोपंथ (7075), नीलकंठ (5696), नंदा देवी (7817), गोरी पर्वत (6250), हाथी पर्वत (6727), नंदा धुंटी (6309), नंदा कोट (6861) देव वन (6853), माना (7273), मृगथनी (6855), पंचाचूली (6905), गुनी (6179), यूंगटागट (6945)।

उत्तराखण्ड के प्रमुख ग्लेशियर

1. गंगोत्री 2. यमुनोत्री 3. पिण्डर 4. खतलिगं 5. मिलम 6. जौलिंकांग, 7. सुन्दर ढूंगा इत्यादि।

उत्तराखण्ड की प्रमुख झीलें (ताल)

गौरीकुण्ड, रूपकुण्ड, नंदीकुण्ड, डूयोढ़ी ताल, जराल ताल, शहस्त्रा ताल, मासर ताल, नैनीताल, भीमताल, सात ताल, नौकुचिया ताल, सूखा ताल, श्यामला ताल, सुरपा ताल, गरूड़ी ताल, हरीश ताल, लोखम ताल, पार्वती ताल, तड़ाग ताल (कुंमाऊँ क्षेत्र) इत्यादि।

उत्तराखण्ड के प्रमुख दर्रे

बरास- 5365मी.,(उत्तरकाशी), माणा- 6608मी. (चमोली), नोती-5300मी. (चमोली), बोल्छाधुरा-5353मी.,(पिथौरागड़), कुरंगी-वुरंगी-5564 मी.( पिथौरागड़), लोवेपुरा-5564मी. (पिथौरागड़), लमप्याधुरा-5553 मी. (पिथौरागड़), लिपुलेश-5129 मी. (पिथौरागड़), उंटाबुरा, थांगला, ट्रेलपास, मलारीपास, रालमपास, सोग चोग ला पुलिग ला, तुनजुनला, मरहीला, चिरीचुन दर्रा।

उत्तराखण्ड के वन अभ्यारण्य

1. गोविन्द वन जीव विहार 2. केदारनाथ वन्य जीव विहार 3. अस्कोट जीव विहार 4. सोना नदी वन्य जीव विहार 5. विनसर वन्य जीव विहार

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तीरथ सिंह रावत

भाजपा राष्ट्रीय सचिव / पूर्व प्रदेश अध्यक्ष / पूर्व शिक्षा मंत्री

ग्राम एवं डाकघर - सीरों, पट्टी असवालस्यूं
पौड़ी गढ़वाल, उत्तराखण्ड , 246155
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